सत्ता की बिसात पर

सत्ता की बिसात

सत्ता की बिसात पर
राजशाही राजा के पक्ष में
हैं, सब मोहरे
“वजीर” है “नौकरशाही”
और “घोड़े”, “बड़े उद्योगपति”
“हाथी” सम “न्याय व्यवस्था”
“ऊंट” से “कार्यकर्ता”
पर, पहले पिटती
“पैदल”, हुई “आम जनता”
“चाल” चलते
वोट मांगते, राजनेता
विकास – भ्रष्टाचार
गरीबी – रोजगार
राष्ट्रवाद – आतंकवाद
जातिवाद – संप्रदायवाद
समसामयिक जुमलों की
श्रंखला, चलती रहती
किसी न किसी मुद्दे पर
रोटी सबकी, सिकती रहती
गरीब भूखा सोए
क्या परवाह
अनाज सड़ता रहे
क्या परवाह
धमाके होते रहे
क्या परवाह
राष्ट्र नीचा देखे
क्या परवाह
विषमता की खाई में
ले अपराध जन्म
क्या परवाह
पैसे की आपाधापी में
हो मूल्य पतन
क्या परवाह
पर
खेल चलता रहे
देश लुटता रहे
सत्ता की बिसात पर
“खिलाड़ी” ही चलते हैं
बाकी तो “मोहरे” हैं
मारते – मरते हैं।